कि वो मज्लिस फ़रोज़ ख़ल्वत नामूस था
रिश्ता-ए हर शम्अ ख़ार कसोत फ़ानूस था
मशहद आशिक़ से कोसों तक जो अगती है हिना
किस क़दर रब हलाक हसरत पा बोस था
हासिल उल्फ़त न देखा जुज़ शिकस्त आरज़ू
ब दिल पीवसता गोया यक लब अफ़्सोस था
क्या कहूँ बीमारी ग़म की फ़राग़त का बयाँ
जो कि खाईआ ख़ून दिल बे मिन्नत कीमोस था
बुत परस्ती है बहार नक़्श बंद यहाये दहर
हर सरीर ख़ामा में यक नाला-ए नाक़ोस था
तब की वाशुद ने रंग यक गुलिस्ताँ गुल क्या
ये दिल वाबस्ता गोया बैज़ा-ए ताऊस था
कल असदؔ को हम ने देखा गोशा-ए ग़म ख़ाना में
दस्त बरसर सर बज़ानोये दिल मायूस था
Responses
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कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है