ख़मोशीवं में तमाशा अदा निकलती है
निगाह से तिरे सुर्मा सा निकलती है
फ़शार तंगी ख़ल्वत से बनती है शबनम
सबा जो ग़ुंचे के पर्दे में जा निकलती है
न पूछ सीना-ए आशिक़ से आब तेग़
कि ज़ख़्म रौज़न दर से हुआ निकलती है
ब रंग शीशा हूँ यक गोशा-ए दिल ख़ाली
कभी परी मिरी ख़ल्वत में आ निकलती है
बहलक़ۂ ख़म गेसू है रासती आमोज़
दहान मार से गोया सबा निकलती है
असद को हसरत अर्ज़ नियाज़ थी दम क़त्ल
हुनूज़ यक सुख़न बे सदा निकलती है
Responses
No comments yet. Be the first to respond.
कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है