शुमार सुब्हा मरग़ोब बुत मुश्किल पसंद आया
तमाशाए ब यक कफ़ बरदन सद पसंद आया
ब फ़ैज़ बे दिली नौमीदी जावेद आसाँ है
कशाईश को हमारा उक़्दा-ए मुश्किल पसंद आया
हवा सैर आईना-ए बे मेहरी क़ातिल
कि अंदाज़ ब ख़ूँ ग़लतीदन बिस्मिल पसंद आया
रवानी हा मौज ख़ून बिस्मिल से टपकता है
कि लुत्फ़ बे तहाशा रफ़तन क़ातिल पसंद आया
असदؔ हर जा सुख़न ने तरह बाग़ ताज़ा डाली है
मुझे रंग बहार अईजादी बीदल पसंद आया
सवाद चश्म बिस्मिल इंतिख़ाब नक़ता आराई
ख़िराम नाज़ बे पुर्वाई क़ातिल पसंद आया
हुई जिस को बहार फ़ुर्सत हस्ती से आगाही
बरनग लाला जाम बादा पर महमिल पसंद आया
Responses
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कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है