जिस ज़ख़्म की हो सकती हो तदबीर रफ़ू की
लिख दीजीव या रब उसे क़िस्मत में अदू की
अच्छा है सर अंगुश्त हिनाई का तसव्वुर
में नज़र आती तो है इक बूँद लहू की
क्यूँ डरते हो उश्शाक़ की बे होसलगी से
याँ तो कोई सुनता नहीं फ़रियाद किसू की
दशने ने कभी मुँह न लगाया हो जिगर को
ख़ंजर ने कभी बात न पोछी हो गुलू की
सद हैफ़ वो नाकाम कि इक उम्र से ग़ालिब
हसरत में रहे एक बुत अरबदा जो की
गो ज़ाहिद बे चारा अबस है
इतना है कि रहती तो है तदबीर वज़ू की
अब बे ख़बरां मेरे लब ज़ख़्म जिगर पर
बख़िया जिसे कहते हो शिकायत है रफ़ू की
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कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है