वाँ पहुँच कर जो ग़श आता पिये हम है हम को
सद रह आहंग ज़मीं बोस क़दम है हम को
को में और मुझे दिल महव वफ़ा रखता है
किस क़दर ज़ौक़ गिरफ़्तारी हम है हम को
ज़ोफ़ से नक़्श पिये मोर है तौक़ गर्दन
तिरे कूचे से कहाँ ताक़त रम है हम को
जान कर कीजे तग़ाफ़ुल कि कुछ अमीद भी हो
ये ग़लत अंदाज़ तो सम है हम को
रश्क हम तरही व दर्द असर बानग हज़ीं
नाला-ए मुर्ग़ सहर तेग़ दो दम है हम को
सर उड़ाने के जो वादे को मुकर्रर चाहा
हँस के बोले कि तिरे सर की क़सम है हम को
दिल के ख़ूँ करने की क्या वज्ह वलीकन नाचार
पास बे रोनक़ी दीदा अहम है हम को
तुम वो नाज़ुक कि ख़मोशी को फ़ुग़ाँ कहते हो
हम वो आजिज़ कि तग़ाफ़ुल भी सितम है हम को
लखनऊ आने का बाइस नहीं खुलता यानी
हवस सैर व तमाशा सो वो कम है हम को
मक़त सलसलۂ शौक़ नहीं है ये शहर
अज़्म सैर नजफ़ व तौफ़ हरम है हम को
लिए जाती है कहीं एक तवक़्क़ो ग़ालिब
जादा-ए रह कशिश काफ़ करम है हम को
अब्र रोता है कि बज़्म तरब आमादा करो
बर्क़ हँसती है कि फ़ुर्सत कोई दम है हम को
ताक़त रंज सफ़र भी नहीं पाते इतनी
हिज्र याराँ वतन का भी अलम है हम को
लाई है मतमद अलदोला बहादर की अमीद
जादा-ए रह कशिश काफ़ करम है हम को
Responses
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कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है