क़दमों में भी तकान थी घर भी क़रीब था
पर क्या करें कि अब के ही अजीब था
निकले अगर तो दरीचे में रुक भी जाए
इस शहर-ए-बे-चराग़ में किस का नसीब था
आँधी ने उन रुतों को भी बे-कार कर दिया
जिन का कभी हुमा सा परिंदा नसीब था
कुछ अपने-आप से ही उसे कश्मकश न थी
मुझ में भी कोई शख़्स उसी का रक़ीब था
पूछा किसी ने मोल तो हैरान रह गया
अपनी निगाह में कोई कितना ग़रीब था
मक़्तल से आने वाली हवा को भी कब मिला
ऐसा कोई दरीचा कि जो बे-सलीब था
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समुंदरों के अधर से कोई सदा आई
दिलों के बंद दरीचे खले हुआ आई
सरक गए थे जो आँचल वो फिर सँवारे गए
खले हुए थे जो सर उन पे फिर रिदा आई
उतर रही हैं अजब ख़ोशबोयीं रग व पय में
ये किस को छू के मिरे शहर में सबा आई
उसे पुकारा तो होंटों पे कोई नाम न था
मोहब्बतों के सफ़र में अजब फ़ज़ा आई
कहीं रहे वो मगर ख़ैरियत के साथ रहे
उठाए हाथ तो याद एक ही दुआ आई
रुकी हुई है अभी तक बहार आँखों में
शब विसाल का जैसे ख़ुमार आँखों में