खुली आँखों में सपना झाँकता है
वो सोया है कि कुछ कुछ जागता है
तिरी चाहत के भीगे जंगलों में
मिरा मोर बन कर नाचता है
मुझे हर कैफ़ियत में क्यूँ न समझे
वो मेरे सब हवाले जानता है
मैं उस की दस्तरस में हूँ मगर वो
मुझे मेरी रज़ा से माँगता है
किसी के ध्यान में डूबा हुआ
बहाने से मुझे भी टालता है
सड़क को छोड़ कर चलना पड़ेगा
कि मेरे घर का कच्चा रास्ता है
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समुंदरों के अधर से कोई सदा आई
दिलों के बंद दरीचे खले हुआ आई
सरक गए थे जो आँचल वो फिर सँवारे गए
खले हुए थे जो सर उन पे फिर रिदा आई
उतर रही हैं अजब ख़ोशबोयीं रग व पय में
ये किस को छू के मिरे शहर में सबा आई
उसे पुकारा तो होंटों पे कोई नाम न था
मोहब्बतों के सफ़र में अजब फ़ज़ा आई
कहीं रहे वो मगर ख़ैरियत के साथ रहे
उठाए हाथ तो याद एक ही दुआ आई
रुकी हुई है अभी तक बहार आँखों में
शब विसाल का जैसे ख़ुमार आँखों में