गए मौसम में जो खिलते थे गुलाबों की तरह
पे उतरेंगे वही ख़्वाब अज़ाबों की तरह
राख के ढेर पे अब बसर करनी है
जल चुके हैं मिरे ख़ेमे मिरे ख़्वाबों की तरह
साअत-ए-दीद कि आरिज़ हैं गुलाबी अब तक
अव्वलीं लम्हों के गुलनार हिजाबों की तरह
वो समुंदर है तो फिर रूह को शादाब करे
तिश्नगी क्यूँ मुझे देता है सराबों की तरह
ग़ैर-मुमकिन है तिरे घर के गुलाबों का शुमार
मेरे रिसते हुए ज़ख़्मों के हिसाबों की तरह
याद तो होंगी वो बातें तुझे अब भी लेकिन
शेल्फ़ में रक्खी हुई बंद किताबों की तरह
कौन जाने कि नए साल में तू किस को पढ़े
तेरा मेआ'र बदलता है निसाबों की तरह
शोख़ हो जाती है अब भी तिरी आँखों की चमक
गाहे गाहे तिरे दिलचस्प जवाबों की तरह
हिज्र की शब मिरी तन्हाई पे दस्तक देगी
तेरी ख़ुश-बू मिरे खोए हुए ख़्वाबों की तरह
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समुंदरों के अधर से कोई सदा आई
दिलों के बंद दरीचे खले हुआ आई
सरक गए थे जो आँचल वो फिर सँवारे गए
खले हुए थे जो सर उन पे फिर रिदा आई
उतर रही हैं अजब ख़ोशबोयीं रग व पय में
ये किस को छू के मिरे शहर में सबा आई
उसे पुकारा तो होंटों पे कोई नाम न था
मोहब्बतों के सफ़र में अजब फ़ज़ा आई
कहीं रहे वो मगर ख़ैरियत के साथ रहे
उठाए हाथ तो याद एक ही दुआ आई
रुकी हुई है अभी तक बहार आँखों में
शब विसाल का जैसे ख़ुमार आँखों में