एक था कि तारों के घराने से उठा
आँख हैरान है क्या ज़माने से उठा
किस से पूछूँ तिरे आक़ा का पता ऐ रहवार
ये अलम वो है न अब तक किसी शाने से उठा
हल्क़ा-ए-ख़्वाब को ही गिर्द-ए-गुलू कस डाला
दस्त-ए-क़ातिल का भी एहसाँ न दिवाने से उठा
फिर कोई अक्स शुआ'ओं से न बनने पाया
कैसा महताब मिरे आइना-ख़ाने से उठा
क्या लिखा था सर-ए-महज़र जिसे पहचानते ही
पास बैठा हुआ हर दोस्त बहाने से उठा
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समुंदरों के अधर से कोई सदा आई
दिलों के बंद दरीचे खले हुआ आई
सरक गए थे जो आँचल वो फिर सँवारे गए
खले हुए थे जो सर उन पे फिर रिदा आई
उतर रही हैं अजब ख़ोशबोयीं रग व पय में
ये किस को छू के मिरे शहर में सबा आई
उसे पुकारा तो होंटों पे कोई नाम न था
मोहब्बतों के सफ़र में अजब फ़ज़ा आई
कहीं रहे वो मगर ख़ैरियत के साथ रहे
उठाए हाथ तो याद एक ही दुआ आई
रुकी हुई है अभी तक बहार आँखों में
शब विसाल का जैसे ख़ुमार आँखों में