धनक धनक मिरी पोरों के ख़्वाब कर देगा
वो लम्स मेरे बदन को गुलाब कर देगा
क़बा-ए-जिस्म के हर तार से गुज़रता हुआ
किरन का प्यार मुझे आफ़्ताब कर देगा
जुनूँ-पसंद है और तुझ तक आने में
बदन को नाव लहू को चनाब कर देगा
मैं सच कहूँगी मगर फिर भी हार जाऊँगी
वो झूट बोलेगा और ला-जवाब कर देगा
अना-परस्त है इतना कि बात से पहले
वो उठ के बंद मिरी हर किताब कर देगा
सुकूत-ए-शहर-ए- में वो फूल सा लहजा
समाअ'तों की फ़ज़ा ख़्वाब ख़्वाब कर देगा
इसी तरह से अगर चाहता रहा पैहम
सुख़न-वरी में मुझे इंतिख़ाब कर देगा
मिरी तरह से कोई है जो ज़िंदगी अपनी
तुम्हारी याद के नाम इंतिसाब कर देगा
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समुंदरों के अधर से कोई सदा आई
दिलों के बंद दरीचे खले हुआ आई
सरक गए थे जो आँचल वो फिर सँवारे गए
खले हुए थे जो सर उन पे फिर रिदा आई
उतर रही हैं अजब ख़ोशबोयीं रग व पय में
ये किस को छू के मिरे शहर में सबा आई
उसे पुकारा तो होंटों पे कोई नाम न था
मोहब्बतों के सफ़र में अजब फ़ज़ा आई
कहीं रहे वो मगर ख़ैरियत के साथ रहे
उठाए हाथ तो याद एक ही दुआ आई
रुकी हुई है अभी तक बहार आँखों में
शब विसाल का जैसे ख़ुमार आँखों में