बख़्त से कोई शिकायत है न अफ़्लाक से है
यही क्या कम है कि निस्बत मुझे इस से है
ख़्वाब में भी तुझे भूलूँ तो रवा रख मुझ से
वो रवय्या जो हवा का ख़स-ओ-ख़ाशाक से है
बज़्म-ए-अंजुम में क़बा की पहनी मैं ने
और मिरी सारी फ़ज़ीलत इसी पोशाक से है
इतनी रौशन है तिरी सुब्ह कि होता है गुमाँ
ये उजाला तो किसी दीदा-ए-नमनाक से है
हाथ तो काट दिए कूज़ा-गरों के हम ने
मो'जिज़े की वही उम्मीद मगर चाक से है
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समुंदरों के अधर से कोई सदा आई
दिलों के बंद दरीचे खले हुआ आई
सरक गए थे जो आँचल वो फिर सँवारे गए
खले हुए थे जो सर उन पे फिर रिदा आई
उतर रही हैं अजब ख़ोशबोयीं रग व पय में
ये किस को छू के मिरे शहर में सबा आई
उसे पुकारा तो होंटों पे कोई नाम न था
मोहब्बतों के सफ़र में अजब फ़ज़ा आई
कहीं रहे वो मगर ख़ैरियत के साथ रहे
उठाए हाथ तो याद एक ही दुआ आई
रुकी हुई है अभी तक बहार आँखों में
शब विसाल का जैसे ख़ुमार आँखों में