अपनी ही सदा सुनूँ कहाँ तक
जंगल की हवा रहूँ कहाँ तक
हर बार हवा न होगी दर पर
हर बार मगर उठूँ कहाँ तक
दम घटता है घर में हब्स वो है
ख़ुश्बू के लिए रुकूँ कहाँ तक
फिर आ के हवाएँ खोल देंगी
ज़ख़्म अपने रफ़ू करूँ कहाँ तक
साहिल पे समुंदरों से बच कर
मैं नाम तिरा लिखूँ कहाँ तक
का एक एक लम्हा
हंगामों से क़र्ज़ लूँ कहाँ तक
गर लम्स नहीं तो लफ़्ज़ ही भेज
मैं तुझ से जुदा रहूँ कहाँ तक
सुख से भी तो दोस्ती कभी हो
दुख से ही गले मिलूँ कहाँ तक
मंसूब हो हर किरन किसी से
अपने ही लिए जलूँ कहाँ तक
आँचल मिरे भर के फट रहे हैं
उस के लिए चुनूँ कहाँ तक
Responses
No comments yet. Be the first to respond.
समुंदरों के अधर से कोई सदा आई
दिलों के बंद दरीचे खले हुआ आई
सरक गए थे जो आँचल वो फिर सँवारे गए
खले हुए थे जो सर उन पे फिर रिदा आई
उतर रही हैं अजब ख़ोशबोयीं रग व पय में
ये किस को छू के मिरे शहर में सबा आई
उसे पुकारा तो होंटों पे कोई नाम न था
मोहब्बतों के सफ़र में अजब फ़ज़ा आई
कहीं रहे वो मगर ख़ैरियत के साथ रहे
उठाए हाथ तो याद एक ही दुआ आई
रुकी हुई है अभी तक बहार आँखों में
शब विसाल का जैसे ख़ुमार आँखों में