मुट्ठी भर लोगों के हाथों में लाखों की तक़दीरें हैं
जुदा हैं धर्म इलाक़े एक सी लेकिन ज़ंजीरें हैं
आज और कल की बात नहीं है सदियों की तारीख़ यही है
हर आँगन में ख़्वाब हैं लेकिन चंद घरों में ताबीरें हैं
जब भी कोई तख़्त सजा है मेरा तेरा बहा है
दरबारों की शान-ओ-शौकत मैदानों की शमशीरें हैं
हर जंगल की एक कहानी वो ही भेंट वही क़ुर्बानी
गूँगी बहरी सारी भेड़ें चरवाहों की जागीरें हैं
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मसजदीं हैं नमाज़ीवं के लिए
अपने घर में कहीं ख़ुदा रखना
जिस्म में फीलने लगा है शहर
अपनी तन्हाइयाँ बचा रखना
मिलना जलना जहाँ ज़रूरी है
मिलने जलने का हौसला रखना
उम्र करने को है पचास को पार
कौन है किस जगह पता रखना
ज़मीं दी है तो थोड़ा सा आसमाँ भी दे
मिरे ख़ुदा मिरे होने का कुछ गुमाँ भी दे
बना के बुत मुझे बीनाई का अज़ाब न दे
ये ही अज़ाब है क़िस्मत तो फिर ज़बाँ भी दे