मोहब्बत में वफ़ादारी से बचिए
जहाँ तक हो अदाकारी से बचिए
हर इक सूरत भली लगती है कुछ दिन
की शो'बदा-कारी से बचिए
शराफ़त आदमियत -मंदी
बड़े शहरों में बीमारी से बचिए
ज़रूरी क्या हर इक महफ़िल में बैठें
तकल्लुफ़ की रवा-दारी से बचिए
बिना पैरों के सर चलते नहीं हैं
बुज़ुर्गों की समझदारी से बचिए
Responses
No comments yet. Be the first to respond.
मसजदीं हैं नमाज़ीवं के लिए
अपने घर में कहीं ख़ुदा रखना
जिस्म में फीलने लगा है शहर
अपनी तन्हाइयाँ बचा रखना
मिलना जलना जहाँ ज़रूरी है
मिलने जलने का हौसला रखना
उम्र करने को है पचास को पार
कौन है किस जगह पता रखना
ज़मीं दी है तो थोड़ा सा आसमाँ भी दे
मिरे ख़ुदा मिरे होने का कुछ गुमाँ भी दे
बना के बुत मुझे बीनाई का अज़ाब न दे
ये ही अज़ाब है क़िस्मत तो फिर ज़बाँ भी दे