वो ज़माना नहीं आता
कुछ ठिकाना नहीं आता
जान जाती दिखाई देती है
उन का आना नज़र नहीं आता
इश्क़ दर-पर्दा फूँकता है आग
ये जलाना नज़र नहीं आता
इक ज़माना मिरी नज़र में रहा
इक ज़माना नज़र नहीं आता
दिल ने इस बज़्म में बिठा तो दिया
उठ के जाना नज़र नहीं आता
रहिए मुश्ताक़-ए-जल्वा-ए-दीदार
हम ने माना नज़र नहीं आता
ले चलो मुझ को राह-रवान-ए-अदम
याँ ठिकाना नज़र नहीं आता
दिल पे बैठा कहाँ से तीर-ए-निगाह
ये निशाना नज़र नहीं आता
तुम मिलाओगे ख़ाक में हम को
दिल मिलाना नज़र नहीं आता
आप ही देखते हैं हम को तो
दिल का आना नज़र नहीं आता
दिल-ए-पुर-आरज़ू लुटा ऐ 'दाग़'
वो ख़ज़ाना नज़र नहीं आता
Responses
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ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं
उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं
बाइस-ए-तर्क-ए-मुलाक़ात बताते भी नहीं
तुम्हारे ख़त में नया एक सलाम किस का था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था
ग़ज़ब किया तेरे वादे पे ऐतबार किया
तमाम रात क़यामत का इंतज़ार किया
आफ़त की शौख़ियाँ हैं तुम्हारी निगाह में
महशर के फ़ित्ने खेलते हैं जिस की राह में
ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा
ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा