साज़ ये कीना-साज़ क्या जानें
नाज़ वाले नियाज़ क्या जानें
शम्अ'-रू आप गो हुए लेकिन
लुत्फ़-ए-सोज़-ओ-गुदाज़ क्या जानें
कब किसी दर की जब्हा-साई की
शैख़ साहब नमाज़ क्या जानें
जो रह-ए- में क़दम रक्खें
वो नशेब-ओ-फ़राज़ क्या जानें
पूछिए मय-कशों से लुत्फ़-ए-शराब
ये मज़ा पाक-बाज़ क्या जानें
बले चितवन तिरी ग़ज़ब री
क्या करेंगे ये नाज़ क्या जानें
जिन को अपनी ख़बर नहीं अब तक
वो मिरे दिल का राज़ क्या जानें
हज़रत-ए-ख़िज़्र जब शहीद न हों
लुत्फ़-ए-उम्र-ए-दराज़ क्या जानें
जो गुज़रते हैं 'दाग़' पर सदमे
आप बंदा-नवाज़ क्या जानें
Responses
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ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं
उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं
बाइस-ए-तर्क-ए-मुलाक़ात बताते भी नहीं
तुम्हारे ख़त में नया एक सलाम किस का था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था
ग़ज़ब किया तेरे वादे पे ऐतबार किया
तमाम रात क़यामत का इंतज़ार किया
आफ़त की शौख़ियाँ हैं तुम्हारी निगाह में
महशर के फ़ित्ने खेलते हैं जिस की राह में
ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा
ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा