इस अदा से वो करते हैं
कोई जाने कि वफ़ा करते हैं
यूँ वफ़ा अहद-ए-वफ़ा करते हैं
आप क्या कहते हैं क्या करते हैं
हम को छेड़ोगे तो पछताओगे
हँसने वालों से हँसा करते हैं
नामा-बर तुझ को सलीक़ा ही नहीं
काम बातों में बना करते हैं
चलिए आशिक़ का जनाज़ा उट्ठा
आप बैठे हुए क्या करते हैं
ये बताता नहीं कोई मुझ को
जो आता है तो क्या करते हैं
हुस्न का हक़ नहीं रहता बाक़ी
हर अदा में वो अदा करते हैं
तीर आख़िर बदल-ए-काफ़िर है
हम अख़ीर आज दुआ करते हैं
रोते हैं ग़ैर का रोना पहरों
ये हँसी मुझ से हँसा करते हैं
इस लिए दिल को लगा रक्खा है
इस में महबूब रहा करते हैं
तुम मिलोगे न वहाँ भी हम से
हश्र से पहले गिला करते हैं
झाँक कर रौज़न-ए-दर से मुझ को
क्या वो शोख़ी से हया करते हैं
उस ने एहसान जता कर ये कहा
आप किस मुँह से गिला करते हैं
रोज़ लेते हैं नया दिल दिलबर
नहीं मालूम ये क्या करते हैं
'दाग़' तू देख तो क्या होता है
जब्र पर सब्र किया करते हैं
Responses
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ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं
उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं
बाइस-ए-तर्क-ए-मुलाक़ात बताते भी नहीं
तुम्हारे ख़त में नया एक सलाम किस का था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था
ग़ज़ब किया तेरे वादे पे ऐतबार किया
तमाम रात क़यामत का इंतज़ार किया
आफ़त की शौख़ियाँ हैं तुम्हारी निगाह में
महशर के फ़ित्ने खेलते हैं जिस की राह में
ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा
ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा