गया तुम ने लिया हम क्या करें
जाने वाली चीज़ का क्या करें
हम ने मर कर हिज्र में पाई शिफ़ा
ऐसे अच्छों का वो मातम क्या करें
अपने ही ग़म से नहीं मिलती नजात
इस बिना पर फ़िक्र-ए-आलम क्या करें
एक साग़र पर है अपनी ज़िंदगी
रफ़्ता रफ़्ता इस से भी कम क्या करें
कर चुके सब अपनी अपनी हिकमतें
दम निकलता हो तो हमदम क्या करें
दिल ने सीखा शेवा-ए-बेगानगी
ऐसे ना-महरम को महरम क्या करें
मा'रका है आज हुस्न ओ इश्क़ का
देखिए वो क्या करें हम क्या करें
आईना है और वो हैं देखिए
फ़ैसला दोनों ये बाहम क्या करें
आदमी होना बहुत दुश्वार है
फिर फ़रिश्ते हिर्स-ए-आदम क्या करें
तुंद-ख़ू है कब सुने वो दिल की बात
और भी बरहम को बरहम क्या करें
हैदराबाद और लंगर याद है
अब के दिल्ली में मोहर्रम क्या करें
कहते हैं अहल-ए-सिफ़ारिश मुझ से 'दाग़'
तेरी क़िस्मत है बुरी हम क्या करें
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ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं
उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं
बाइस-ए-तर्क-ए-मुलाक़ात बताते भी नहीं
तुम्हारे ख़त में नया एक सलाम किस का था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था
ग़ज़ब किया तेरे वादे पे ऐतबार किया
तमाम रात क़यामत का इंतज़ार किया
आफ़त की शौख़ियाँ हैं तुम्हारी निगाह में
महशर के फ़ित्ने खेलते हैं जिस की राह में
ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा
ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा