चुरा कर नज़र चुराई है
लुट गए लुट गए दुहाई है
एक दिन मिल के फिर नहीं मिलते
किस क़यामत की ये जुदाई है
ऐ असर कर न इंतिज़ार-ए-
माँगना सख़्त बे-हयाई है
मैं यहाँ हूँ वहाँ है दिल मेरा
ना-रसाई अजब रसाई है
इस तरह अहल-ए-नाज़ नाज़ करें
बंदगी है कि ये ख़ुदाई है
पानी पी पी के तौबा करता हूँ
पारसाई सी पारसाई है
वा'दा करने का इख़्तियार रहा
बात करने में क्या बुराई है
कब निकलता है अब जिगर से तीर
ये भी क्या तेरी आश्नाई है
'दाग़' उन से दिमाग़ करते हैं
नहीं मालूम क्या समाई है
Responses
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ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं
उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं
बाइस-ए-तर्क-ए-मुलाक़ात बताते भी नहीं
तुम्हारे ख़त में नया एक सलाम किस का था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था
ग़ज़ब किया तेरे वादे पे ऐतबार किया
तमाम रात क़यामत का इंतज़ार किया
आफ़त की शौख़ियाँ हैं तुम्हारी निगाह में
महशर के फ़ित्ने खेलते हैं जिस की राह में
ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा
ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा