जुगनू गुहर उजाले तो दे गया
वो ख़ुद को ढूँडने के हवाले तो दे गया
अब इस से बढ़ के क्या हो विरासत फ़क़ीर की
बच्चों को अपनी भीक के प्याले तो दे गया
अब मेरी सोच साए की सूरत है उस के गिर्द
मैं बुझ के अपने को हाले तो दे गया
शायद कि फ़स्ल-ए-संग-ज़नी कुछ क़रीब है
वो खेलने को बर्फ़ के गाले तो दे गया
अहल-ए-तलब पे उस के लिए फ़र्ज़ है दुआ
ख़ैरात में वो चंद निवाले तो दे गया
'मोहसिन' उसे क़बा की ज़रूरत न थी मगर
दुनिया को रोज़-ओ-शब के दोशाले तो दे गया
Responses
No comments yet. Be the first to respond.