यक-ज़र्रा-ए-ज़मीं नहीं बे-कार बाग़ का
याँ जादा भी फ़तीला है लाले के दाग़ का
बे-मय किसे है ताक़त-ए-आशोब-ए-आगही
खींचा है इज्ज़-ए-हौसला ने ख़त अयाग़ का
बुलबुल के कारोबार पे हैं ख़ंदा-हा-ए-
कहते हैं जिस को ख़लल है दिमाग़ का
ताज़ा नहीं है नश्शा-ए-फ़िक्र-ए-सुख़न मुझे
तिर्याकी-ए-क़दीम हूँ दूद-ए-चराग़ का
सौ बार बंद-ए-इश्क़ से आज़ाद हम हुए
पर क्या करें कि दिल ही अदू है फ़राग़ का
बे-ख़ून-ए-दिल है चश्म में मौज-ए-निगह ग़ुबार
ये मय-कदा ख़राब है मय के सुराग़ का
बाग़-ए-शगुफ़्ता तेरा बिसात-ए-नशात-ए-दिल
अब्र-ए-बहार ख़ुम-कद किस के दिमाग़ का?
जोश-ए-बहार-ए-कुल्फ़त-ए-नज़्ज़ारा है 'असद'
है अब्र पम्बा रौज़न-ए-दीवार-ए-बाग़ का
Responses
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कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है