वुसअत-ए-सई-ए-करम देख कि सर-ता-सर-ए-
गुज़रे है आबला-पा अब्र-ए-गुहर-बार हुनूज़
यक-क़लम काग़ज़-ए-आतिश-ज़दा है सफ़्हा-ए-दश्त
नक़्श-ए-पा में है तब-ए-गर्मी-ए-रफ़्तार हुनूज़
दाग़-ए-अतफ़ाल है ब-कोहसार हुनूज़
ख़ल्वत-ए-संग में है नाला तलब-गार हुनूज़
ख़ाना है सैल से ख़ू-कर्दा-ए-दीदार हुनूज़
दूरबीं दर-ज़दा है रख़्ना-ए-दीवार हुनूज़
आई यक-उम्र से मअज़ूर-ए-तमाशा नर्गिस
चश्म-ए-शबनम में न टूटा मिज़ा-ए-ख़ार हुनूज़
क्यूँ हुआ था तरफ़-ए-आबला-ए-पा या-रब
जादा है वा-शुदन-ए-पेचिश-ए-तूमार हुनूज़
हों ख़मोशी-ए-चमन हसरत-ए-दीदार 'असद'
मिज़ा है शाना-कश-ए-तुर्रा-ए-गुफ़्तार हुनूज़
Responses
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कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है