रुख़-ए-निगार से है सोज़-ए-जावेदानी-ए-शमअ'
हुई है आतिश-ए- आब-ए-ज़ि़ंदगानी-ए-शमअ'
-ए-अहल-ए-ज़बाँ में है मर्ग-ए-ख़ामोशी
ये बात बज़्म में रौशन हुई ज़बानी-ए-शमअ'
करे है सर्फ़ ब-ईमा-ए-शो'ला क़िस्सा तमाम
ब-तर्ज़-ए-अहल-ए-फ़ना है फ़साना-ख़्वानी-ए-शमअ'
ग़म उस को हसरत-ए-परवाना का है ऐ शो'ले
तिरे लरज़ने से ज़ाहिर है ना-तवानी-ए-शमअ'
तिरे ख़याल से रूह एहतिज़ाज़ करती है
ब-जल्वा-रेज़ी-ए-बाद-ओ-ब-पर-फ़िशानी-ए-शमअ'
नशात-ए-दाग़-ए-ग़म-ए-इश्क़ की बहार न पूछ
शगुफ़्तगी है शहीद-ए-गुल-ए-खिज़ानी-ए-शमअ'
जले है देख के बालीन-ए-यार पर मुझ को
न क्यूँ हो दिल पे मिरे दाग़-ए-बद-गुमानी-ए-शमअ'
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कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है