रहा गर कोई ता-क़यामत सलामत
फिर इक रोज़ मरना है हज़रत-सलामत
जिगर को मिरे -ए-खूँ-नाबा-मशरब
लिखे है ख़ुदावंद-ए-नेमत सलामत
अलर्रग़्म-ए-दुश्मन शहीद-ए-वफ़ा हूँ
मुबारक मुबारक सलामत सलामत
नहीं गर सर-ओ-बर्ग-ए-इदराक-ए-मानी
तमाशा-ए-नैरंग-ए-सूरत सलामत
दो-आलम की हस्ती पे ख़त्त-ए- खींच
दिल-ओ-दस्त-ए-अरबाब-ए-हिम्मत सलामत
नहीं गर ब-काम-ए-दिल-ए-ख़स्ता गर्दूं
जिगर-ख़ाई-ए-जोश-ए-हसरत सलामत
न औरों की सुनता न कहता हूँ अपनी
सर-ए-ख़स्ता दुश्वार-ए-वहशत सलामत
वफ़ूर-ए-बला है हुजूम-ए-वफ़ा है
सलामत मलामत मलामत सलामत
न फ़िक्र-ए-सलामत न बीम-ए-मलामत
ज़े-ख़ुद-रफ़्तगी-हा-ए-हैरत सलामत
रहे 'ग़ालिब'-ए-ख़स्ता मग़्लूब-ए-गर्दूं
ये क्या बे-नियाज़ी है हज़रत-सलामत
Responses
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कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है