क़तरा-ए-मय बस-कि हैरत से नफ़स-परवर हुआ
ख़त्त-ए-जाम-ए-मै सरासर रिश्ता-ए-गौहर हुआ
ए'तिबार-ए- की ख़ाना-ख़राबी देखना
ग़ैर ने की आह लेकिन वो ख़फ़ा मुझ पर हुआ
गरमी-ए-दौलत हुइ आतिश-ज़न-ए-नाम-ए-निको
ख़ाना-ए-ख़ातिम में याक़ूत-ए-नगीं अख़्तर हुआ
नश्शा में गुम-कर्दा- आया वो मस्त-ए-फ़ित्ना-ख़ू
आज रंग-रफ़्ता दौर-ए-गर्दिश-ए-साग़र हुआ
दर्द से दर-पर्दा दी मिज़्गाँ-सियाहाँ ने शिकस्त
रेज़ा रेज़ा उस्तुख़्वाँ का पोस्त में नश्तर हुआ
ज़ोहद गरदीदन है गर्द-ए-ख़ाना-हा-ए-मुनइमाँ
दाना-ए-तस्बीह से मैं मोहरा-दर-शश्दर हुआ
ऐ ब-ज़ब्त-ए-हाल-ए-ना-अफ़्सुर्दागाँ जोश-ए-जुनूँ
नश्शा-ए-मय है अगर यक-पर्दा नाज़ुक-तर हुआ
इस चमन में रेशा-दारी जिस ने सर खेंचा 'असद'
तर ज़बान-ए-लुत्फ़-ए-आम-ए-साक़ी-ए-कौसर हुआ
Responses
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कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है