नहीं है ज़ख़्म कोई बख़िये के दर-ख़ुर मिरे तन में
हुआ है तार-ए-अश्क-ए-यास रिश्ता चश्म-ए-सोज़न में
हुई है माने-ए-ज़ौक़-ए-तमाशा ख़ाना-वीरानी
कफ़-ए-सैलाब बाक़ी है ब-रंग-ए-पुम्बा रौज़न में
वदीअत-ख़ाना-ए-बेदाद-ए-काविश-हा-ए-मिज़गाँ हूँ
नगीन-ए-नाम-ए-शाहिद है मिरे हर क़तरा-ए-ख़ूँ तन में
बयाँ किस से हो ज़ुल्मत-गुस्तरी मेरे शबिस्ताँ की
-ए-मह हो जो रख दूँ पुम्बा दीवारों के रौज़न में
निकोहिश माना-ए-बे-रब्ती-ए-शोर-ए-जुनूँ आई
हुआ है ख़ंदा-ए-अहबाब बख़िया जेब-ओ-दामन में
हुए उस मेहर-वश के जल्वा-ए-तिमसाल के आगे
पर-अफ़्शाँ जौहर आईने में मिस्ल-ए-ज़र्रा रौज़न में
न जानूँ नेक हूँ या बद हूँ पर सोहबत-मुख़ालिफ़ है
जो हूँ तो हूँ गुलख़न में जो ख़स हूँ तो हूँ गुलशन में
हज़ारों दिल दिये जोश-ए-जुनून-ए-इश्क़ ने मुझ को
सियह हो कर सुवैदा हो गया हर क़तरा-ए-ख़ूँ तन में
'असद' ज़िंदानी-ए-तासीर-ए-उल्फ़त-हा-ए-ख़ूबाँ हूँ
ख़म-ए-दस्त-ए-नवाज़िश हो गया है तौक़ गर्दन में
फ़ुज़ूँ की दोस्तों ने हिर्स-ए-क़ातिल ज़ौक़-ए-कुश्तन में
होए हैं बख़िया-हा-ए-ज़ख़्म जौहर तेग़-ए-दुश्मन में
तमाशा करदनी है लुत्फ़-ए-ज़ख़्म-ए-इंतिज़ार ऐ दिल
सुवैदा दाग़-ए-मर्हम मर्दुमुक है चश्म-ए-सोज़न में
दिल-ओ-दीन-ओ-ख़िरद ताराज-ए-नाज़-ए-जल्वा-पैराई
हुआ है जौहर-ए-आईना ख़ेल-ए-मोर ख़िर्मन में
निकोहिश माने-ए-दीवानगी-हा-ए-जुनूँ आई
लगाया ख़ंदा-ए-नासेह ने बख़िया जेब-ओ-दामन में
Responses
No comments yet. Be the first to respond.
कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है