न हुई गर मिरे मरने से तसल्ली न सही
इम्तिहाँ और भी बाक़ी हो तो ये भी न सही
ख़ार ख़ार-ए-अलम-ए-हसरत-ए-दीदार तो है
शौक़ गुल-चीन-ए-गुलिस्तान-ए-तसल्ली न सही
मय-परस्ताँ ख़ुम-ए-मय मुँह से लगाए ही बने
एक दिन गर न हुआ बज़्म में साक़ी न सही
नफ़स-ए-क़ैस कि है चश्म-ओ--ए-सहरा
गर नहीं शम-ए-सियह-ख़ाना-ए-लैली न सही
एक हंगामे पे मौक़ूफ़ है घर की रौनक़
नौहा-ए- ही सही नग़्मा-ए-शादी न सही
न सताइश की तमन्ना न सिले की पर्वा
गर नहीं हैं मिरे अशआ'र में मा'नी न सही
इशरत-ए-सोहबत-ए-ख़ूबाँ ही ग़नीमत समझो
न हुई 'ग़ालिब' अगर उम्र-ए-तबीई न सही
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कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है