मुज़्दा ऐ ज़ौक़-ए-असीरी कि आता है
दाम-ए-ख़ाली क़फ़स-ए-मुर्ग़-ए-गिरफ़्तार के पास
जिगर-ए-तिश्ना-ए-आज़ार तसल्ली न हुआ
जू-ए-ख़ूँ हम ने बहाई बुन-ए-हर ख़ार के पास
मुँद गईं खोलते ही खोलते आँखें है है
ख़ूब वक़्त आए तुम इस आशिक़-ए-बीमार के पास
मैं भी रुक रुक के न मरता जो ज़बाँ के बदले
दशना इक तेज़ सा होता मिरे -ख़्वार के पास
दहन-ए-शेर में जा बैठे लेकिन ऐ दिल
न खड़े हो जिए ख़ूबान-ए-दिल-आज़ार के पास
देख कर तुझ को चमन बस-कि नुमू करता है
ख़ुद-ब-ख़ुद पहुँचे है गुल गोशा-ए-दस्तार के पास
मर गया फोड़ के सर ग़ालिब-ए-वहशी है है
बैठना उस का वो आ कर तिरी दीवार के पास
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कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है