मत मर्दुमक-ए-दीदा में समझो ये निगाहें
हैं जम्अ सुवैदा-ए--ए-चश्म में आहें
किस पे है अज़्म-ए-सफ़-ए-मिज़्गान-ए-ख़ुद-आरा
आईने के पायाब से उतरी हैं सिपाहें
दैर-ओ-हरम आईना-ए-तकरार-ए-तमन्ना
वामांदगी-ए-शौक़ तराशे है पनाहें
जूँ मर्दुमक-ए-चश्म से हों जम्अ' निगाहें
ख़्वाबीदा ब-हैरत-कदा-ए-दाग़ हैं आहें
फिर हल्क़ा-ए-काकुल में पड़ीं दीद की राहें
जूँ दूद फ़राहम हुईं रौज़न में निगाहें
पाया सर-ए-हर-ज़र्रा जिगर-गोशा-ए-वहशत
हैं दाग़ से मामूर शक़ाइक़ की कुलाहें
ये मतला 'असद' जौहर-ए-अफ़्सून-ए-सुख़न हो
गर अर्ज़-ए-तपाक-ए-जिगर-ए-सोख़्ता चाहें
हैरत-कश-ए-यक-जल्वा-ए-मअनी हैं निगाहें
खींचूँ हूँ सुवैदा-ए-दिल-ए-चश्म से आहें
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कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है