मंज़ूर थी ये शक्ल तजल्ली को की
क़िस्मत खुली तिरे क़द-ओ-रुख़ से ज़ुहूर की
इक ख़ूँ-चकाँ में करोड़ों बनाओ हैं
पड़ती है आँख तेरे शहीदों पे हूर की
वाइ'ज़ न तुम पियो न किसी को पिला सको
क्या बात है तुम्हारी शराब-ए-तहूर की
लड़ता है मुझ से हश्र में क़ातिल कि क्यूँ उठा
गोया अभी सुनी नहीं आवाज़ सूर की
आमद बहार की है जो बुलबुल है नग़्मा-संज
उड़ती सी इक ख़बर है ज़बानी तुयूर की
गो वाँ नहीं प वाँ के निकाले हुए तो हैं
का'बे से इन बुतों को भी निस्बत है दूर की
क्या फ़र्ज़ है कि सब को मिले एक सा जवाब
आओ न हम भी सैर करें कोह-ए-तूर की
गर्मी सही कलाम में लेकिन न इस क़दर
की जिस से बात उस ने शिकायत ज़रूर की
'ग़ालिब' गर इस सफ़र में मुझे साथ ले चलें
हज का सवाब नज़्र करूँगा हुज़ूर की
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कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है