लूँ वाम बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता से यक-ख़्वाब-ए-खुश वले
'ग़ालिब' ये ख़ौफ़ है कि कहाँ से अदा करूँ
ख़ुश वहशते कि अर्ज़-ए--ए-फ़ना करूँ
जूँ गर्द-ए- जामा-ए-हस्ती क़बा करूँ
आ ऐ बहार-ए-नाज़ कि तेरे ख़िराम से
दस्तार गिर्द-ए-शाख़-ए-गुल-ए-नक़्श-ए-पा करूँ
ख़ुश उफ़्तादगी कि ब-सहरा-ए-इन्तिज़ार
जूँ जादा गर्द-ए-रह से निगह सुर्मा-सा करूँ
सब्र और ये अदा कि दिल आवे असीर-ए-चाक
दर्द और ये कमीं कि रह-ए-नाला वा करूँ
वो बे-दिमाग़-ए-मिन्नत-ए-इक़बाल हूँ कि मैं
वहशत ब-दाग़-ए-साया-ए-बाल-ए-हुमा करूँ
वो इल्तिमास-ए-लज्ज़त-ए-बे-दाद हूँ कि मैं
तेग़-ए-सितम को पुश्त-ए-ख़म-ए-इल्तिजा करूँ
वो राज़-ए-नाला हूँ कि ब-शरह-ए-निगाह-ए-अज्ज़
अफ़्शाँ ग़ुबार-ए-सुर्मा से फ़र्द-ए-सदा करूँ
Responses
No comments yet. Be the first to respond.
कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है