लाग़र इतना हूँ कि गर तू बज़्म में जा दे मुझे
मेरा ज़िम्मा देख कर गर कोई बतला दे मुझे
क्या तअ'ज्जुब है जो उस को देख कर आ जाए रहम
वाँ तलक कोई किसी हीले से पहुँचा दे मुझे
मुँह न दिखलावे न दिखला पर ब--ए-इताब
खोल कर ज़रा आँखें ही दिखला दे मुझे
याँ तलक मेरी गिरफ़्तारी से वो ख़ुश है कि मैं
ज़ुल्फ़ गर बन जाऊँ तो शाने में उलझा दे मुझे
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कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है