जादा-ए-रह ख़ुर को वक़्त-ए-शाम है तार-ए-शुआअ'
चर्ख़ वा करता है माह-ए-नौ से आग़ोश-ए-विदा'अ
शम्अ' से है बज़्म-ए-अंगुश्त-ए-तहय्युर दर दहन
शोला-ए-आवाज़-ए-ख़ूबाँ पर ब-हंगाम-ए-सिमाअ'
जूँ पर-ए-ताऊस जौहर तख़्ता मश्क़-ए-रंग है
बस-कि है वो क़िबला-ए-आईना महव-ए-इख़तिराअ'
रंजिश-ए-हैरत-सरिश्ताँ सीना-साफ़ी पेशकश
जौहर-ए-आईना है याँ गर्द-ए-मैदान-ए-नज़ाअ'
चार सू-ए-दहर में -ए-ग़फ़लत गर्म है
अक़्ल के नुक़साँ से उठता है ख़याल-ए-इन्तिफ़ाअ'
आश्ना 'ग़ालिब' नहीं हैं -ए-दिल के आश्ना
वर्ना किस को मेरे अफ़्साने की ताब-ए-इस्तिमाअ'
Responses
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कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है