है बज़्म-ए-बुताँ में आज़ुर्दा-लबों से
तंग आए हैं हम ऐसे ख़ुशामद-तलबों से
है दौर-ए-क़दह वज्ह-ए-परेशानी-ए-सहबा
यक-बार लगा दो ख़ुम-ए-मय मेरे लबों से
रिंदाना-ए-दर-ए-मय-कदा गुस्ताख़ हैं ज़ाहिद
ज़िन्हार न होना तरफ़ इन बे-अदबों से
बेदाद-ए-वफ़ा देख कि जाती रही आख़िर
हर-चंद मिरी जान को था रब्त लबों से
क्या पूछे है बर-ख़ुद ग़लती-हा-ए-अज़ीज़ाँ
ख़्वारी को भी इक आर है अआली-नसबों से
गो तुम को रज़ा-जूई-ए-अग़्यार है लेकिन
जाती है मुलाक़ात कब ऐसे सबबों से
मत पूछ '' वअ'दा-ए-कम-फ़ुर्सती-ए-ज़ीस्त
दो दिन भी जो काटे तू क़यामत तअबों से
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कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है