धमकी में मर गया जो न बाब-ए-नबर्द था
-ए-नबर्द-पेशा तलबगार-ए-मर्द था
था में मर्ग का खटका लगा हुआ
उड़ने से पेश-तर भी मिरा रंग ज़र्द था
तालीफ़ नुस्ख़ा-हा-ए-वफ़ा कर रहा था मैं
मजमुआ-ए-ख़याल अभी फ़र्द फ़र्द था
दिल ता जिगर कि साहिल-ए-दरिया-ए-ख़ूँ है अब
इस रहगुज़र में जल्वा-ए-गुल आगे गर्द था
जाती है कोई कश्मकश अंदोह-ए-इश्क़ की
दिल भी अगर गया तो वही दिल का दर्द था
अहबाब चारासाज़ी-ए-वहशत न कर सके
ज़िंदाँ में भी ख़याल बयाबाँ-नवर्द था
ये लाश-ए-बे-कफ़न 'असद'-ए-ख़स्ता-जाँ की है
हक़ मग़्फ़िरत करे अजब आज़ाद मर्द था
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कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है