दर-ख़ुर-ए-क़हर-ओ-ग़ज़ब जब कोई हम सा न हुआ
फिर ग़लत क्या है कि हम सा कोई पैदा न हुआ
बंदगी में भी वो आज़ादा ओ ख़ुद-बीं हैं कि हम
उल्टे फिर आए दर-ए-का'बा अगर वा न हुआ
सब को मक़्बूल है दा'वा तिरी यकताई का
रू-ब-रू कोई बुत-ए-आइना-सीमा न हुआ
कम नहीं नाज़िश-ए-हमनामी-ए-चश्म-ए-ख़ूबाँ
तेरा बीमार बुरा क्या है गर अच्छा न हुआ
सीने का दाग़ है वो नाला कि लब तक न गया
का रिज़्क़ है वो क़तरा कि दरिया न हुआ
नाम का मेरे है जो दुख कि किसी को न मिला
काम में मेरे है जो फ़ित्ना कि बरपा न हुआ
हर-बुन-ए-मू से दम-ए-ज़िक्र न टपके ख़ूँ नाब
हमज़ा का क़िस्सा हुआ का चर्चा न हुआ
क़तरा में दजला दिखाई न दे और जुज़्व में कुल
खेल लड़कों का हुआ दीदा-ए-बीना न हुआ
थी ख़बर गर्म कि 'ग़ालिब' के उड़ेंगे पुर्ज़े
देखने हम भी गए थे प तमाशा न हुआ
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कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है