बला से हैं जो ये पेश-ए- दर-ओ-दीवार
-ए-शौक़ को हैं बाल-ओ-पर दर-ओ-दीवार
वुफ़ूर-ए-अश्क ने काशाने का किया ये रंग
कि हो गए मिरे दीवार-ओ-दर दर-ओ-दीवार
नहीं है साया कि सुन कर नवेद-ए-मक़दम-ए-यार
गए हैं चंद क़दम पेश-तर दर-ओ-दीवार
हुई है किस क़दर अर्ज़ानी-ए-मय-ए-जल्वा
कि मस्त है तिरे कूचे में हर दर-ओ-दीवार
जो है तुझे सर-ए-सौदा-ए-इन्तिज़ार तो आ
कि हैं दुकान-ए-मता-ए-नज़र दर-ओ-दीवार
हुजूम-ए-गिर्या का सामान कब किया मैं ने
कि गिर पड़े न मिरे पाँव पर दर-ओ-दीवार
वो आ रहा मिरे हम-साए में तो साए से
हुए फ़िदा दर-ओ-दीवार पर दर-ओ-दीवार
नज़र में खटके है बिन तेरे घर की आबादी
हमेशा रोते हैं हम देख कर दर-ओ-दीवार
न पूछ बे-ख़ुदी-ए-ऐश-ए-मक़दम-ए-सैलाब
कि नाचते हैं पड़े सर-ब-सर दर-ओ-दीवार
न कह किसी से कि 'ग़ालिब' नहीं ज़माने में
हरीफ़-ए-राज़-ए-मोहब्बत मगर दर-ओ-दीवार
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कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है