बहुत सही -ए-गीती शराब कम क्या है
ग़ुलाम-ए-साक़ी-ए-कौसर हूँ मुझ को क्या है
तुम्हारी तर्ज़-ओ-रविश जानते हैं हम क्या है
रक़ीब पर है अगर लुत्फ़ तो सितम क्या है
सुख़न में ख़ामा-ए-ग़ालिब की आतिश-अफ़्शानी
यक़ीं है हम को भी लेकिन अब उस में दम क्या है
कटे तो शब कहें काटे तो साँप कहलावे
कोई बताओ कि वो ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म क्या है
लिखा करे कोई अहकाम-ए-ताला-ए-मौलूद
किसे ख़बर है कि वाँ जुम्बिश-ए-क़लम क्या है
न हश्र-ओ-नश्र का क़ाएल न केश ओ मिल्लत का
ख़ुदा के वास्ते ऐसे की फिर क़सम क्या है
वो दाद-ओ-दीद गराँ-माया शर्त है हमदम
वगर्ना मेहर-ए-सुलेमान-ओ-जाम-ए-जम क्या है
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कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है