अजब नशात से जल्लाद के चले हैं हम आगे
कि अपने साए से सर पाँव से है दो क़दम आगे
क़ज़ा ने था मुझे चाहा ख़राब-ए-बादा-ए-उल्फ़त
फ़क़त ख़राब लिखा बस न चल सका क़लम आगे
-ए-ज़माना ने झाड़ी नशात-ए-इश्क़ की मस्ती
वगरना हम भी उठाते थे अज़्ज़त-ए-अलम आगे
के वास्ते दाद उस जुनून-ए-शौक़ की देना
कि उस के दर पे पहुँचते हैं नामा-बर से हम आगे
ये उम्र भर जो परेशानियाँ उठाई हैं हम ने
तुम्हारे अइयो ऐ तुर्रह-हा-ए-ख़म-ब-ख़म आगे
दिल ओ जिगर में पुर-अफ़्शा जो एक मौजा-ए-ख़ूँ है
हम अपने ज़ोम में समझे हुए थे उस को दम आगे
क़सम जनाज़े पे आने की मेरे खाते हैं 'ग़ालिब'
हमेशा खाते थे जो मेरी जान की क़सम आगे
Responses
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कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है