आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे
ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे
हसरत ने ला रखा तिरी बज़्म-ए-ख़याल में
गुल-दस्ता-ए- सुवैदा कहें जिसे
फूँका है किस ने गोश-ए-मोहब्बत में ऐ
अफ़्सून-ए-इंतिज़ार तमन्ना कहें जिसे
सर पर हुजूम-ए-दर्द-ए-ग़रीबी से डालिए
वो एक मुश्त-ए-ख़ाक कि सहरा कहें जिसे
है चश्म-ए-तर में हसरत-ए-दीदार से निहाँ
शौक़-ए-इनाँ गुसेख़्ता दरिया कहें जिसे
दरकार है शगुफ़्तन-ए-गुल-हा-ए-ऐश को
सुब्ह-ए-बहार पुम्बा-ए-मीना कहें जिसे
'ग़ालिब' बुरा न मान जो वाइ'ज़ बुरा कहे
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे
या रब हमें तो ख़्वाब में भी मत दिखाइयो
ये महशर-ए-ख़याल कि दुनिया कहें जिसे
है इंतिज़ार से शरर आबाद रुस्तख़ेज़
मिज़्गान-ए-कोह-कन रग-ए-ख़ारा कहें जिसे
किस फ़ुर्सत-ए-विसाल पे है गुल को अंदलीब
ज़ख़्म-ए-फ़िराक़ ख़ंदा-ए-बे-जा कहें जिसे
Responses
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कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है