आईना देख अपना सा मुँह ले के रह गए
साहब को न देने पे कितना ग़ुरूर था
क़ासिद को अपने हाथ से गर्दन न मारिए
उस की ख़ता नहीं है ये मेरा क़ुसूर था
ज़ोफ़-ए-जुनूँ को वक़्त-ए-तपिश दर भी दूर था
इक घर में मुख़्तसर बयाबाँ ज़रूर था
ऐ वाए-ग़फ़लत-ए-निगह-ए-शौक़ वर्ना याँ
हर पारा संग लख़्त-ए--ए-कोह-ए-तूर था
दर्स-ए-तपिश है बर्क़ को अब जिस के नाम से
वो दिल है ये कि जिस का तख़ल्लुस सुबूर था
हर रंग में जला 'असद'-ए-फ़ित्ना-इन्तिज़ार
परवाना-ए-तजल्ली-ए-शम-ए-ज़ुहूर था
शायद कि मर गया तिरे रुख़्सार देख कर
पैमाना रात माह का लबरेज़-ए-नूर था
जन्नत है तेरी तेग़ के कुश्तों की मुंतज़िर
जौहर सवाद-ए-जल्वा-ए-मिज़्गान-ए-हूर था
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कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है