ज़ख़्म झेले दाग़ भी खाए बहुत
लगा कर हम तो पछताए बहुत
जब न तब जागह से तुम जाया किए
हम तो अपनी ओर से आए बहुत
दैर से सू-ए-हरम आया न टुक
हम मिज़ाज अपना इधर लाए बहुत
फूल शम्स ओ क़मर सारे ही थे
पर हमें इन में तुम्हीं भाए बहुत
गर बुका इस शोर से शब को है तो
रोवेंगे सोने को हम-साए बहुत
वो जो निकला सुब्ह जैसे आफ़्ताब
रश्क से गुल फूल मुरझाए बहुत
'मीर' से पूछा जो मैं आशिक़ हो तुम
हो के कुछ चुपके से शरमाए बहुत
Responses
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मीर उस ग़ज़ल को ख़ूब कहा था ज़मीर ने
पर ऐ ज़बाँ दराज़ बहुत हो चुकी ख़मोश
शश जिहत से उस में ज़ालिम बू ख़ूँ की राह है
तेरा कोचा हम से तो कह किस की बिस्मिल गाह है
एक नभने का नहीं मिज़्गाँ तलक बोझल हैं सब
कारवाँ लख़्त दिल हर अश्क के हम राह है
हम ज्वानों को न छोड़ा उस से सब पकड़े गए
ये दो साला दुख़्तर रज़ किस क़दर शताह है
पा बरहना ख़ाक सर में मू परेशाँ सीना चाक
हाल मेरा देखने आ तेरे ही दिल ख़्वाह है
उस जुनूँ पर मीर कोई भी फिरे है शहर में
जादा-ए सहरा से कर साज़िश जो तुझ से राह है