उस का ख़याल चश्म से ख़्वाब ले गया
क़स्मे कि जी से मिरे ताब ले गया
किन नींदों अब तू सोती है ऐ चश्म-ए-गिर्या-नाक
मिज़्गाँ तो खोल शहर को सैलाब ले गया
आवे जो मस्तबा में तो सुन लो कि राह से
वाइज़ को एक जाम-ए-मय-ए-नाब ले गया
ने दिल रहा बजा है न सब्र ओ हवास ओ होश
आया जो सैल-ए-इश्क़ सब अस्बाब ले गया
मेरे हुज़ूर शम्अ ने गिर्या जो सर किया
रोया मैं इस क़दर कि मुझे आब ले गया
अहवाल उस शिकार ज़ुबूँ का है जाए रहम
जिस ना-तवाँ को मुफ़्त न क़स्साब ले गया
मुँह की झलक से यार के बेहोश हो गए
शब हम को 'मीर' परतव-ए-महताब ले गया
Responses
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मीर उस ग़ज़ल को ख़ूब कहा था ज़मीर ने
पर ऐ ज़बाँ दराज़ बहुत हो चुकी ख़मोश
शश जिहत से उस में ज़ालिम बू ख़ूँ की राह है
तेरा कोचा हम से तो कह किस की बिस्मिल गाह है
एक नभने का नहीं मिज़्गाँ तलक बोझल हैं सब
कारवाँ लख़्त दिल हर अश्क के हम राह है
हम ज्वानों को न छोड़ा उस से सब पकड़े गए
ये दो साला दुख़्तर रज़ किस क़दर शताह है
पा बरहना ख़ाक सर में मू परेशाँ सीना चाक
हाल मेरा देखने आ तेरे ही दिल ख़्वाह है
उस जुनूँ पर मीर कोई भी फिरे है शहर में
जादा-ए सहरा से कर साज़िश जो तुझ से राह है