था मुस्तआर से उस के जो नूर था
ख़ुर्शीद में भी उस ही का ज़र्रा ज़ुहूर था
हंगामा गर्म-कुन जो -ए-ना-सुबूर था
पैदा हर एक नाले से शोर-ए-नुशूर था
पहुँचा जो आप को तो मैं पहुँचा ख़ुदा के तईं
मालूम अब हुआ कि बहुत मैं भी दूर था
आतिश बुलंद दिल की न थी वर्ना ऐ कलीम
यक शो'ला बर्क़-ए-ख़िर्मन-ए-सद-कोह-ए-तूर था
मज्लिस में रात एक तिरे परतवे बग़ैर
क्या शम्अ क्या पतंग हर इक बे-हुज़ूर था
उस फ़स्ल में कि गुल का गरेबाँ भी है हवा
दीवाना हो गया सो बहुत ज़ी-शुऊर था
मुनइ'म के पास क़ाक़ुम ओ संजाब था तो क्या
उस रिंद की भी रात गुज़र गई जो ऊर था
हम ख़ाक में मिले तो मिले लेकिन ऐ सिपहर
उस शोख़ को भी राह पे लाना ज़रूर था
कल पाँव एक कासा-ए-सर पर जो आ गया
यकसर वो उस्तुख़्वान शिकस्तों से चूर था
कहने लगा कि देख के चल राह बे-ख़बर
मैं भी कभू किसू का सर-ए-पुर-ग़ुरूर था
था वो तो रश्क-ए-हूर-ए-बहिश्ती हमीं में 'मीर'
समझे न हम तो फ़हम का अपनी क़ुसूर था
Responses
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मीर उस ग़ज़ल को ख़ूब कहा था ज़मीर ने
पर ऐ ज़बाँ दराज़ बहुत हो चुकी ख़मोश
शश जिहत से उस में ज़ालिम बू ख़ूँ की राह है
तेरा कोचा हम से तो कह किस की बिस्मिल गाह है
एक नभने का नहीं मिज़्गाँ तलक बोझल हैं सब
कारवाँ लख़्त दिल हर अश्क के हम राह है
हम ज्वानों को न छोड़ा उस से सब पकड़े गए
ये दो साला दुख़्तर रज़ किस क़दर शताह है
पा बरहना ख़ाक सर में मू परेशाँ सीना चाक
हाल मेरा देखने आ तेरे ही दिल ख़्वाह है
उस जुनूँ पर मीर कोई भी फिरे है शहर में
जादा-ए सहरा से कर साज़िश जो तुझ से राह है