मुँह तका ही करे है जिस तिस का
हैरती है ये आईना किस का
शाम से कुछ बुझा सा रहता हूँ
हुआ है चराग़ मुफ़्लिस का
थे बुरे मुग़्बचों के तेवर लेक
शैख़ मय-ख़ाने से खिसका
दाग़ आँखों से खिल रहे हैं सब
हाथ दस्ता हुआ है नर्गिस का
बहर कम-ज़र्फ़ है बसान-ए-हबाब
कासा-लैस अब हुआ है तू जिस का
फ़ैज़ ऐ अब्र चश्म-ए-तर से उठा
आज दामन वसीअ है इस का
ताब किस को जो हाल-ए-मीर सुने
हाल ही और कुछ है मज्लिस का
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मीर उस ग़ज़ल को ख़ूब कहा था ज़मीर ने
पर ऐ ज़बाँ दराज़ बहुत हो चुकी ख़मोश
शश जिहत से उस में ज़ालिम बू ख़ूँ की राह है
तेरा कोचा हम से तो कह किस की बिस्मिल गाह है
एक नभने का नहीं मिज़्गाँ तलक बोझल हैं सब
कारवाँ लख़्त दिल हर अश्क के हम राह है
हम ज्वानों को न छोड़ा उस से सब पकड़े गए
ये दो साला दुख़्तर रज़ किस क़दर शताह है
पा बरहना ख़ाक सर में मू परेशाँ सीना चाक
हाल मेरा देखने आ तेरे ही दिल ख़्वाह है
उस जुनूँ पर मीर कोई भी फिरे है शहर में
जादा-ए सहरा से कर साज़िश जो तुझ से राह है