हम हुए तुम हुए कि 'मीर' हुए
उस की ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए
जिन की ख़ातिर की उस्तुख़्वाँ-शिकनी
सो हम उन के निशान-ए- हुए
नहीं आते कसो की आँखों में
हो के आशिक़ बहुत हक़ीर हुए
आगे ये बे-अदाइयाँ कब थीं
इन दिनों तुम बहुत शरीर हुए
अपने रोते ही रोते सहरा के
गोशे गोशे में आब-गीर हुए
ऐसी हस्ती में दाख़िल है
नय जवाँ हम न तिफ़्ल-ए-शीर हुए
एक दम थी नुमूद बूद अपनी
या सफ़ेदी की या अख़ीर हुए
या'नी मानिंद-ए-सुब्ह दुनिया में
हम जो पैदा हुए सौ पीर हुए
मत मिल अहल-ए-दुवल के लड़कों से
'मीर'-जी उन से मिल फ़क़ीर हुए
Responses
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मीर उस ग़ज़ल को ख़ूब कहा था ज़मीर ने
पर ऐ ज़बाँ दराज़ बहुत हो चुकी ख़मोश
शश जिहत से उस में ज़ालिम बू ख़ूँ की राह है
तेरा कोचा हम से तो कह किस की बिस्मिल गाह है
एक नभने का नहीं मिज़्गाँ तलक बोझल हैं सब
कारवाँ लख़्त दिल हर अश्क के हम राह है
हम ज्वानों को न छोड़ा उस से सब पकड़े गए
ये दो साला दुख़्तर रज़ किस क़दर शताह है
पा बरहना ख़ाक सर में मू परेशाँ सीना चाक
हाल मेरा देखने आ तेरे ही दिल ख़्वाह है
उस जुनूँ पर मीर कोई भी फिरे है शहर में
जादा-ए सहरा से कर साज़िश जो तुझ से राह है