क्या हक़ीक़त कहूँ कि क्या है
हक़-शनासों के हाँ है इश्क़
दिल लगा हो तो जी जहाँ से उठा
मौत का नाम प्यार का है इश्क़
और तदबीर को नहीं कुछ दख़्ल
इश्क़ के दर्द की दवा है इश्क़
क्या डुबाया मुहीत में ग़म के
हम ने जाना था आश्ना है इश्क़
इश्क़ से जा नहीं कोई ख़ाली
दिल से ले अर्श तक भरा है इश्क़
कोहकन क्या पहाड़ काटेगा
पर्दे में ज़ोर-आज़मा है इश्क़
इश्क़ है इश्क़ करने वालों को
कैसा कैसा बहम किया है इश्क़
कौन मक़्सद को इश्क़ बिन पहुँचा
आरज़ू इश्क़ मुद्दआ है इश्क़
'मीर' मरना पड़े है ख़ूबाँ पर
इश्क़ मत कर कि बद बला है इश्क़
Responses
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मीर उस ग़ज़ल को ख़ूब कहा था ज़मीर ने
पर ऐ ज़बाँ दराज़ बहुत हो चुकी ख़मोश
शश जिहत से उस में ज़ालिम बू ख़ूँ की राह है
तेरा कोचा हम से तो कह किस की बिस्मिल गाह है
एक नभने का नहीं मिज़्गाँ तलक बोझल हैं सब
कारवाँ लख़्त दिल हर अश्क के हम राह है
हम ज्वानों को न छोड़ा उस से सब पकड़े गए
ये दो साला दुख़्तर रज़ किस क़दर शताह है
पा बरहना ख़ाक सर में मू परेशाँ सीना चाक
हाल मेरा देखने आ तेरे ही दिल ख़्वाह है
उस जुनूँ पर मीर कोई भी फिरे है शहर में
जादा-ए सहरा से कर साज़िश जो तुझ से राह है