जिन के लिए अपने तो यूँ जान निकलते हैं
इस में वे जैसे अंजान निकलते हैं
क्या तीर-ए-सितम उस के सीने में भी टूटे थे
जिस ज़ख़्म को चीरूँ हूँ पैकान निकलते हैं
मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों
तब के पर्दे से इंसान निकलते हैं
किस का है क़िमाश ऐसा गूदड़ भरे हैं सारे
देखो न जो लोगों के दीवान निकलते हैं
गह लोहू टपकता है गह लख़्त-ए-दिल आँखों से
या टुकड़े जिगर ही के हर आन निकलते हैं
करिए तो गिला किस से जैसी थी हमें ख़्वाहिश
अब वैसे ही ये अपने अरमान निकलते हैं
जागह से भी जाते हो मुँह से भी ख़शिन हो कर
वे हर्फ़ नहीं हैं जो शायान निकलते हैं
सो काहे को अपनी तू जोगी की सी फेरी है
बरसों में कभू ईधर हम आन निकलते हैं
उन आईना-रूयों के क्या 'मीर' भी आशिक़ हैं
जब घर से निकलते हैं हैरान निकलते हैं
Responses
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मीर उस ग़ज़ल को ख़ूब कहा था ज़मीर ने
पर ऐ ज़बाँ दराज़ बहुत हो चुकी ख़मोश
शश जिहत से उस में ज़ालिम बू ख़ूँ की राह है
तेरा कोचा हम से तो कह किस की बिस्मिल गाह है
एक नभने का नहीं मिज़्गाँ तलक बोझल हैं सब
कारवाँ लख़्त दिल हर अश्क के हम राह है
हम ज्वानों को न छोड़ा उस से सब पकड़े गए
ये दो साला दुख़्तर रज़ किस क़दर शताह है
पा बरहना ख़ाक सर में मू परेशाँ सीना चाक
हाल मेरा देखने आ तेरे ही दिल ख़्वाह है
उस जुनूँ पर मीर कोई भी फिरे है शहर में
जादा-ए सहरा से कर साज़िश जो तुझ से राह है