जब रोने बैठता हूँ तब क्या कसर रहे है
रूमाल दो दो दिन तक जूँ अब्र तर रहे है
आह-ए- की मेरी बर्छी के वसवसे से
ख़ुर्शीद के मुँह ऊपर अक्सर सिपर रहे है
आगह तो रहिए उस की तर्ज़-ए-रह-ओ-रविश से
आने में उस के लेकिन किस को ख़बर रहे है
उन रोज़ों इतनी ग़फ़लत अच्छी नहीं इधर से
अब इज़्तिराब हम को दो दो पहर रहे है
आब-ए-हयात की सी सारी रविश है उस की
पर जब वो उठ चले है एक आध मर रहे है
तलवार अब लगा है बे-डोल पास रखने
ख़ून आज कल किसू का वो शोख़ कर रहे है
दर से कभू जो आते देखा है मैं ने उस को
तब से उधर ही अक्सर मेरी रहे है
आख़िर कहाँ तलक हम इक रोज़ हो चुकेंगे
बरसों से वादा-ए-शब हर सुब्ह पर रहे है
'मीर' अब बहार आई सहरा में चल जुनूँ कर
कोई भी फ़स्ल-ए-गुल में नादान घर रहे है
Responses
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मीर उस ग़ज़ल को ख़ूब कहा था ज़मीर ने
पर ऐ ज़बाँ दराज़ बहुत हो चुकी ख़मोश
शश जिहत से उस में ज़ालिम बू ख़ूँ की राह है
तेरा कोचा हम से तो कह किस की बिस्मिल गाह है
एक नभने का नहीं मिज़्गाँ तलक बोझल हैं सब
कारवाँ लख़्त दिल हर अश्क के हम राह है
हम ज्वानों को न छोड़ा उस से सब पकड़े गए
ये दो साला दुख़्तर रज़ किस क़दर शताह है
पा बरहना ख़ाक सर में मू परेशाँ सीना चाक
हाल मेरा देखने आ तेरे ही दिल ख़्वाह है
उस जुनूँ पर मीर कोई भी फिरे है शहर में
जादा-ए सहरा से कर साज़िश जो तुझ से राह है