बार-हा गोर-ए- झंका लाया
अब के शर्त-ए-वफ़ा बजा लाया
क़द्र रखती न थी मता-ए-
सारे आलम में मैं दिखा लाया
दिल कि यक क़तरा ख़ूँ नहीं है बेश
एक आलम के सर बला लाया
सब पे जिस बार ने गिरानी की
उस को ये ना-तवाँ उठा लाया
दिल मुझे उस गली में ले जा कर
और भी ख़ाक में मिला लाया
इब्तिदा ही में मर गए सब यार
इश्क़ की कौन इंतिहा लाया
अब तो जाते हैं बुत-कदे से 'मीर'
फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया
Responses
No comments yet. Be the first to respond.
मीर उस ग़ज़ल को ख़ूब कहा था ज़मीर ने
पर ऐ ज़बाँ दराज़ बहुत हो चुकी ख़मोश
शश जिहत से उस में ज़ालिम बू ख़ूँ की राह है
तेरा कोचा हम से तो कह किस की बिस्मिल गाह है
एक नभने का नहीं मिज़्गाँ तलक बोझल हैं सब
कारवाँ लख़्त दिल हर अश्क के हम राह है
हम ज्वानों को न छोड़ा उस से सब पकड़े गए
ये दो साला दुख़्तर रज़ किस क़दर शताह है
पा बरहना ख़ाक सर में मू परेशाँ सीना चाक
हाल मेरा देखने आ तेरे ही दिल ख़्वाह है
उस जुनूँ पर मीर कोई भी फिरे है शहर में
जादा-ए सहरा से कर साज़िश जो तुझ से राह है